Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
घनीभूता घनत्वेन चिद्घना गगनाङ्गणे ।
नानापदार्थरूपेण स्फुरति स्वात्मनात्मनि ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने स्वरूपभूत आकाशरूपी
आँगन में अपने से ही घनीभूत हुई यह चिति मानों मेघ बनकर स्थित हो पृथिवी आदि मूर्ताकार
नाना पदार्थों के रूप से स्फुरित हो रही है