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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

विचित्ररत्नरश्म्योघ इव नानात्मकं जगत् । आभासमात्रं न त्वात्मा न घनं न च पार्थिवम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

रत्नों का किरण-जाल-सा निबिड़ित प्रभापुंज-सा आभासमात्र भासता है