Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
रूपालोकनमात्रं हि शून्यमेव जगत्स्थितम् ।
खे विचित्रमणिव्यूहकरजालमिवोत्थितम् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञानी महानुभावं
की दृष्टि में यह सारा जगत् रूपों का आलोकमात्र, आकाश में विचित्र मणिसमूह के किरणजाल-
सा उत्थित, एकमात्र शून्यस्वरूप ही स्थित है