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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 5, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 5, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

तपसा बहुरूपेण यमेन नियमेन च । अक्षीणायुरतिष्ठत्स पुरा कल्पचतुष्टयम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

अनेक तरह के तप, यम ओर नियम से अक्षीणायु (परिपूर्ण आयु) होकर पूर्व कालमें वह चार कल्पं तक स्थित रहा