Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, Verses 1–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 50, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इमे ये जीवसंघाता दृश्यन्ते दश दिग्गताः ।
नरनागसुरागेन्द्रगन्धर्वाद्यभिधानकाः ॥ १ ॥
ते स्वप्नजागराः केचित्केचित्संकल्पजागराः ।
केचित्केवलजाग्रत्स्थाश्चिराज्जाग्रत्स्थिताः परे ॥ २ ॥
घनजाग्रत्स्थिताश्चान्ये जाग्रत्स्वप्नास्तथेतरे ।
क्षीणजागरकाः केचिज्जीवाः सप्तविधाः स्मृताः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
वासना यदि न रहे तो सब जीव एक ही है" इस उक्ति से अन्त में जो एकमात्र
विचित्रवासना के प्रभाव से जीवों के सात प्रकार बतलाये गये हैः उनका लक्षणों से निरूपण
करने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामचन्द्रजी, ये जो दसों दिशाओं में नर, हाथी, देवता,
वृक्ष, इन्द्र, गन्धर्व आदि नाम धारणकर तत्-तत् विचित्र देह से जीव दिखाई पड़ते हैं, वे कोई तो
स्वप्नजाग्रत् (स्वप्न को जाग्रत् समझनेवाले), कोई संकल्प को जाग्रत् समझनेवाले, कोई केवल
जाग्रत् में स्थिति रखनेवाले और कोई दीर्घकालिकी जाग्रत में स्थिति रखनेवाले हैं। कोई घनीभूत
जाग्रत् में स्थित हैं, कोई जाग्रत् ओर स्वप्न में स्थित हैं, कोई क्षीण जाग्रत् अवस्था में स्थित है, यों
सात तरह के विभागों से उनका परिगणन किया गया है
सर्ग सन्दर्भ
उनचासवाँ सर्ग समाप्त पचासवाँ सर्ग वासना की दृढता ओर शिथिलता के कारण जीव सात प्रकार के हो जाते हैं, यह बोधार्थ वर्णन।