Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 50, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
ध्यानाद्विलुठिता वाथ मनोराज्यवशानुगाः ।
संकल्पदार्ढ्यमापन्ना गलिताग्रानुभूतयः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जीवट आख्यान में वर्णित भिक्षु के समान ये जीव
ध्यान से विचलित होकर स्थित हैँ । मनोराज्य के वश में पड़कर उसके पीछे दौडते हैँ । दृढ संकल्प
धारण करते हैं ओर पूर्वावस्था की स्मृति से शून्य हैं