Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, Verses 13–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 50, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 13,14
संस्कृत श्लोक
संकल्पनात्मकजगज्जीर्णोदुम्बरकीटकाः ।
स्वप्नजागरकाः प्रोक्ताः श्रृणु संकल्पजागरान् ॥ १३ ॥
कस्मिंश्चित्प्राक्तने कल्पे कस्मिंश्चिज्जगति क्वचित् ।
अनिद्रालव एवान्तः संकल्पैकपराः स्थिताः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्नजाग्रत जीवो का उपहार करते हुए अब स्रंकल्पजाग्रतों का निरूपण करते हैं।
भद्र, यह तो मैंने स्वप्नजाग्रत जीवों का निरूपण आपसे किया, जो संकल्परूप जगदात्मक
जीर्ण उदुम्बर वृक्ष के कीट हैं, अब आप संकल्पजाग्रत जीवों के विषय में सुनिये । इस प्रकार के जीव
किसी एक पूर्वकल्प में किसी एक जगत् में कहीं पर अपने भीतर तनिक भी निद्रा न लेकर एकमात्र
संकल्प में तत्पर होकर स्थित हैं