Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 50, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
संकल्पजागराः प्रोक्ता एते संकल्पशायिनः ।
जीवा जीवितगा लोकाः श्रृणु केवलजागरान् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र,
संकल्प के ऊपर निर्भर रहनेवाले ये संकल्पजाग्रत जीव हमने आपसे कहे । ये दृश्यमान जीव
उन्हीके संकल्पजीवन मेँ प्रवेश करते हैं और हम लोगों के लोक भी ऐसे ही हैँ । यानी उनका यदि
संकल्प है, तो दृश्यमान जीव हैं और हम लोगों के लोक भी हँ । अब आप केवल जाग्रत जीवों को
सुनिए