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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 50, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

प्राथम्येनावतीर्णास्ते ब्रह्मणो बृंहितात्मनः । प्रोक्ताः केवलजागर्याः प्रागुत्पत्त्यविकासिनः ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

सृष्टि का संकल्प करने के कारण हलचल से युक्त हुए, आगे कहे जानेवाले ब्रह्मा के रूप से वे जीव इस कल्प में पहले से ही शरीरधारी होकर रहते हैं और उस जन्म में स्वप्न न होने के कारण केवल जाग्रत कहे जाते हैं चूँकि वे पहले के उत्पत्ति विकासरूप स्वप्न से रहित हैं और पहले का जाग्रत्संस्कार भी जाग्रत-स्थिति को उत्पन्न कर स्वयं नष्ट हो गया है, इसलिए इस कल्प में वह स्वप्न का कारण हो भी नहीं सकता