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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 50, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

क्वचिदेव प्रसुप्तानां यः स्वप्नः स्वयमुत्थितः । विषयः सोऽयमस्माकं तेषां स्वप्ननरा वयम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

कहीं पर सोये हुए उन जीवों को जो स्वप्न हुआ है, वही जब समान -कर्म-वासना के कारण हम लोगों का विषय बन जाता है, तब हम उनके स्वप्ननर बन जाते हैं