Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
सबाह्याभ्यन्तरात्मैकमनन्तं देशकालतः ।
बोधामोदप्रसरणं जगदेव प्रबुध्यताम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
वस्तुतः चेतन नाम की वस्तु न भीतर हैं और न बाहर है, किन्तु अनन्त हैं, उसी के भीतर
चुयन्ध ओर पुष्य की नाई बाह्म-आध्यन्तर की एकमात्र कल्पना की गरड हैं, यों कहते हैं ।
बाह्य ओर आभ्यन्तर जिसमें विद्यमान है ओर जो देश एवं काल के परिच्छेद से अलग हे, उस
बोधस्वरूप आत्मा का ही यह जगत् एक तरह से सुगन्ध-विस्तार है, यह आप जानिए