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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

अयमेव परो लोको भाव्यतां वासनाक्षयः । शाम्यतां परलोकस्थं काः किलायान्ति वासनाः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि शक्रा हो कि समस्त जगत्‌ की कल्पना यहीं पर हैं, तो ब्रह्मलोक आदि परलोक जिसमें अर्वि आदि मार्गो से गमन किया जाता हैं / दूर कर्यो माने जाते हैं; इसका समाधान यह हैं कि केसे ही लोगों की अनादि काल से वासना हैं. इसलिए जब कासना का विनाथ हो जायेगा, तो सभी लोग एकमात्र अपने आत्यरूप से अत्यन्त निकट हो जायेगे, इस आशय से कहते हैं ।/ श्रीरामचन्द्रजी, वासना का विनाश हो जाने पर यह आत्मा ही परलोक है, दूसरा नहीं, यह आप जानिये । जो महापुरुष सब उपद्रवों से निर्मुक्त होकर शान्त हो रहे हैं, उनके परलोक के रूप में यहीं पर स्थित आत्मा की ओर दुरत्वादि वासनाएँ आ ही नहीं सकतीं