Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अकारणं महाबुद्धे न कार्यमुपलभ्यते ।
तज्जाग्रतः केवलस्य न कश्चिदिह संभवः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, आपकी शंका तो बहुत ही ग्राधारण हे कि कूटस्थ अद्य ब्रह्म से केवलजाग्रत जीव
तो उत्पन्न हो नहीं सकते, क्योंकि अन्य जीवों की और जगत् की भी उत्पत्ति तन्मूलक नहीं हो
सकेगी, इसलिए कूटस्थ ब्रह्म में जीव ओर जयद्भाव का अपलाप किये बिना ठीक-ठीक उपदेश
नहीं हो सकता, अतः उपदेशार्थ ही ब्रह्म में जीव-जयद्भाव की कल्पना शति, स्मृति आदि में की
गई है, ऐसा उत्तर महारज वस्तिष्ठजी देते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : महामते, कोई भी कार्य किसी कारण के बिना उपलब्ध नहीं हो
सकता, यह निश्चित है, इसलिए केवल जगत् का यहाँ कोई संभव ही नहीं है