Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
चित्तमात्रतया बुद्धं मृगतृष्णाम्बुवत्स्थितम् ।
जाग्रत्स्वप्नत्वमायाति विचारविकलीकृतम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जाग्रतू-दशा में यदि हम लोग यह विचार करें कि यह जयत् केवल चित्तरुप ही है, तो वह
स्वप्नतुल्य ही बन जायेगा / इसी वास्तविकता को लेकर ज्ञानी की सृष्टि को उसके शरीर के
अक्यवो की उपमा दी यई हैं, यों उफसहार करते हुए तत्वज्ञान हो जाने पर उसका भी समूल बाध
हो जाता है, यह कहते हैं ।
भद्र वास्तव में मृगतृष्णा के जल के सदृश असद्रूप से स्थित तथा विचार से विकल किया गया
यह जाग्रत् जगत् केवल चित्तरूप यदि समझ लिया जाता है,तो फिर वह स्वप्नरूप बन जाता
है