Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
जहाति पिण्डकाठिन्यं जाग्रत्स्वप्नावबोधतः ।
परां पेलवतामेति हेम द्रुतमिवाग्निना ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
इससे पहले की बात प़िद्ध हो यह कि जाग्रत् प्रफव ही स्वप्नदशा में अपनी स्थूलता छोड़कर
सूक्ष्म प्रपंचकप बन जाता है और स्वप्नभ्रान्ति ही विरकाल के अभ्यास से घनीभूत होकर जाग्रत्-
रूप बन जाती है, यह कहते हैं ।
स्वप्न के अवभास से जाग्रत्-प्रपंच अपनी कठिनता छोड़ देता है और ऐसे अत्यन्त नरम
(सूक्ष्म) हो जाता है, जैसे कि अग्नि से पिघला हुआ सुवर्ण