Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
यथास्थितं बोध एव घनतामिव गच्छति ।
विनैव देशकालाभ्यां तौ विनिर्माय हेमवत् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
देश-कालरूप निमित्त के बिना
जाग्रत्-स्वप्न का निर्माण कर यथास्थित बोधरूप साक्षी चेतन ही घनस्वरूप जगदाकार-सा
सुवर्ण के सदृश बन जाता है