Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
जाग्रतो वस्तुतः शून्यात्परिज्ञातान्निवर्तते ।
चित्तभ्रमात्मनो भ्रान्तिरूपास्वादनभावना ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
केवल चित्त के ही विलासस्वरूप स्वप्नात्मक फूल-माला, चन्दन आदि की भोगभावना जाग्रत्
पुरुष की निकल जाती है, क्योकि वस्तुतः उसने उन पदार्थो को शून्यरूप जान लिया है