Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
स्वप्नादिव परिज्ञाताद्रसो दृश्यान्निवर्तते ।
द्रष्ट्रदृश्यदशादोषग्रन्थिच्छेदः प्रवर्तते ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, स्वप्न
के सदृश दृश्य पदार्थो को जब जान लिया जाता है, तब उससे मनुष्य का प्रेम निकल जाता है ओर
द्रष्टा, दृश्य की अवस्थाओं के दोष से जनित बड़ी भारी गाँठ है, वह विच्छिन्न हो जाती है