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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 40

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 40

संस्कृत श्लोक

नीरसः शान्तमननो निर्वाणाहंकृतिः कृती । वीतरागो निरायासः शान्तस्तिष्ठति बुद्धधीः ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

इसकी ।िवृत्ति हो जाने पर यह केसे स्थित रहता है 2 यह कहते हैं / दृश्य पदार्थ जिसको नीरस हो गये हैं या बन्धु आदि में जिसको प्रेम नहीं रह गया है, जिसकी मननशक्ति शान्त हो गई है, जिसका अहंकार चला गया है, जो तत्त्वविद्या से परिपूर्ण वीतराग, प्रयासरहित और निर्मलबुद्धि हो चुका है वह सदा शान्त ही रहता है