Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
बोधाद्दीपांशुजालाभमघनं व्योम दृश्यते ।
भ्रान्तिरूपं जगत्कृत्स्नं गन्धर्वनगरं यथा ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञान से पूर्व गन्धर्वनगर के सदृश प्रतीत हो रहा
सम्पूर्ण जगत् तत्त्वज्ञान से दीपक की किरणों के सदृश एकमात्र प्रकाशरूप एवं सघन होकर आकाश
के सदृश भासने लगता है