Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
भवत्येकसमाधानसौम्यात्मा व्योमनिर्मलः ।
तिष्ठत्यपगतासङ्गः स्थित एवाप्यसत्समः ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानी पुरुष एकमात्र आत्मसमाधि में चित्त को लगाकर आकाश के सदृश निर्मल बन जाता है,
सब आसक्तयों से रहित होकर ही अपनी स्थिति बनाता है और स्थित रहकर भी असत् के
तुल्य बना रहता है