Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
न कश्चिदेव कुरुते शरीराणि कदाचन ।
न मोहयति भूतानि कश्चिदेव कदाचन ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
हाँ. यह बात ठीक होती, यदि शरीरादि का कर्ताः मोहित होनेवाला, मोहक आदि-ये छव
श्रुति आरि प्रमाणो से सत्यकूप ठहरते, परन्तु वाचारम्धणम्" आदि श्रुतियों के द्वारा वे सक मिथ्या
ही सिद्ध होते हैं; ऐसी स्थिति में प्रतिभासमात्र स्वरूप उन सवका कूटस्थ ब्रह्म के द्वारा विवर्तमात्र
से भी निर्वाह हो सकता हैं, इसलिए उनकी आवश्यकता नहीं है, यह कहते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, कोई कभी भी शरीर आदि की रचना नहीं करता और न
कभी कोई प्राणियों को मोहित ही करता है