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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 52, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

एवं स्थिते द्रव्यनाशे ब्रह्मणस्तन्मयत्वतः । नानन्तत्वं न चास्तित्वं न च वै संभवत्यलम् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

ठीक है, नाश हो जाय, क्या दोष हैं, इस पर कहते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, ऐसी स्थिति में तो द्रव्य का नाश होने पर ब्रह्म की अनन्तता और अस्तिता भी नहीं रह सकती, क्योकि ब्रह्म जगन्मय ही तो ठहरा और चिदेकरस निरवयव ब्रह्म का जगत्‌ अवयव नहीं हो सकता । तात्पर्य यह है कि जैसे शाखा आदि अवयवो का नाश होने पर वृक्ष का भी नाश हो जाता है, वैसे ही यदि पृथिवी आदि द्रव्य का नाश होने पर ब्रह्म के नाश का प्रसंग माना जाय, तो श्रुति में कहे गये ब्रह्म के अनन्तत्व की सिद्धि न हो सकेगी । इतना ही नहीं ओर भी सुनिये-विचारकर देखने पर तो अवयवो से पृथक्‌ किये गये अवयवी की सत्ता न रहने से उसका अस्तित्व ही नहीं सिद्ध हो सकता ओर चिदेकरस निरवयव ब्रह्म का यह जगत्‌ अवयव भी नहीं बन सकता