Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 52, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
मदशक्तिरिव ज्ञानमिति नास्मासु सिध्यति ।
देहो विज्ञानतोऽस्माकं स्वप्नवन्न तु तत्त्वतः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
चिदात्मा का अवयव जड़ जयत् न हो, किन्तु मदिरा (शराव) के अवयर्वो में स्थित मदशक्ति
की तरह शीर में परिणत पथिकी आदि पंचभूतरूप जड़ों का ही धर्म वेतन्य क्यो न हो, इस वावकि
मत को उठाकर उसमे दोष दिखलाते है /
मदिरा की शक्ति के समान ज्ञानरूप धर्म हम आस्तिको मे नहीं हो सकता । पृथिवी आदिरूप
हम लोगों की देह में ही चार्वाक ज्ञान नहीं सिद्ध कर सकते, क्योकि हम लोगों के मत में इस देह की
सिद्धि विज्ञान के ही अधीन होने से यह देह स्वप्न के समान है, तात्विक नहीं है । तात्पर्य यह है कि
प्रामाणिक लोगों के मत में देह की सत्ता का साधक विज्ञान के सिवा और कोई दूसरा नहीं है । यह
तो कोई नहीं कह सकता कि, मदशक्ति की तरह देह न रहने पर भी विज्ञान उत्पन्न हो सकता हे