Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 52, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यथैतन्नानुभूतं सद्यथैतदनुभूयते ।
यथैतत्सिद्धिमाप्नोति तदिदं कथ्यते क्रमात् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
अब एक स्वभाव उल परमात्मवस्तु के प्रतिपादन की प्रतिज्ञा करते हैं
यह परमात्मस्वरूप जिस रीति से अनुभूत नहीं होता ओर अनुभूत न होते भी जैसे अनुभूत
होता है तथा जिस रीति से मनुष्य को इस परमात्मस्वरूपानुभव की सिद्धि प्राप्त होती है, हे
श्रीरामचन्द्रजी, वह सब मैं आपसे क्रमशः कहता हूँ