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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 52, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

इदं शान्तमनाद्यन्तं तद्रूपत्वाद्विचारतः । व्योमाभं बोधतामात्रमनुभूतिप्रमाणतः ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

परिशेषात्‌ वस्तु एक स्वभाव हैं, यह मान लेने पर तो उपजीव्य एक वित्स्वभाव का ही शेष रह जाता हैं, यह कहते हैं / विचार तथा अपने अनुभवरूप प्रमाण से यह सब शान्त, अनादि, अनन्त और आकाश के सदश निर्मल केवल बोधमात्र परमात्मा ही अवशेष रहता है । अनुभवरूप प्रमाण ही सभी कल्पनाओं का सार (बल) है, अतः उस बोधमात्र परमात्मवस्तु के स्वभाव का अपलाप न हो सकने से परिशेषात्‌ जड़ स्वभाव की ही हानि है, यह भाव है