Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 52, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
सर्वदर्शनसिद्धान्ते नास्ति भेदो न वस्तुनि ।
परमार्थमये तेन विवादेन किमत्र नः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
(५) अथवा देशात्मक, कालात्मक या क्रियात्मक तत्-तत् पदार्थो मेँ अनुगत बीज को एक
स्वभाव ही बतलाना उचित है, यह संभव नहीं है कि एक वस्तु भिन्न-भिन्न स्वभाव की हो ।
यदि स्वभावभेद स्वीकार कर लिया जाय, तो फिर एकत्व की उपपत्ति नहीं हो सकती । देखिये-
यदि वस्तु देशैकस्वभाव है, तो फिर वह काल का कार्य नहीं कर सकती । यह भी कहीं नहीं देखा
गया कि घटस्वभाव वस्तु पट का कार्य करती हो ।
नाना स्वभाव की एक ही वस्तु है, यह कहनेवाला तो सभी दर्शनों के भिद्धान्त का उलघनकारी
होने से वितण्डा करनेवाला ही होगा, इस आशय से कहते हैं /
सभी दर्शनों के सिद्धान्त में यह निश्चय किया गया है कि वस्तु के एक रहते हुए कार्यों का भेद
नहीं है तथा परमार्थमय वस्तु स्वभाव में भी नानात्व ही है । इसलिए सभी दर्शनों से विरुद्ध
बोलनेवाले के साथ विवाद करने से हमें मतलब ही क्या ?