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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 52, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

सर्वदैव हि भिन्नात्मा स्वाङ्गभूतोपलम्भदृक् । स जगद्द्वैतमेवेदं हेमेवाङ्गदरूपकम् ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

अपने अंगरूप जगत्‌ से द्रष्टा परमात्मा मिथ्या नाम- रूपात्मक द्वैत जगत्‌ से सर्वदा ऐसे भिन्न है, जैसे कल्पित अंगदादि आभूषणात्मक मिथ्या नाम- रूपसे सुवर्ण