Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 52, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
हेमपिण्डाद्यथा भाण्डजालं नानोपलभ्यते ।
तथा न लभ्यते भिन्नं परमार्थघनाज्जगत् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
तब क्या अलंकारों की तरह भेद से भी जग्रत् सत् है 2 इसका नही" यह उत्तर देते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, जिस तरह सुवर्ण के आभूषण तथा पात्र आदि सुवर्णपिण्ड से पृथक्-
भिन्न सद्रूप से उपलब्ध नहीं होता