Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 52, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
अयं त्वमहमित्यादित्रिंकालगजगद्भ्रमः ।
तत्रास्ति हेमपिण्डान्तरिव रूपकजालकम् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
सुवर्णपिण्ड के भीतर आभूषण तथा मुद्रा आदि का समूह कल्पना से स्थित है, वैसे ही हे
श्रीरामचन्द्रजी, अयं, त्वम्, अहम् इत्यादि त्रैकालिक जगत्भरम भी उस परमात्मा में कल्पना से
स्थित है