Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 52, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
अनिखातैव भातीयं त्रिजगच्छालभञ्जिका ।
स्वरसस्येव दृश्यत्वमिता ब्रह्मणि दारुणि ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
महास्तम्भ में अनुत्कीर्णं प्रतिमा की नाई, ब्रह्मरूपी
काठ में यह त्रिलोकी रूप प्रतिमा साक्षीरूपी शिल्पी की आँखों में प्राप्त हुई-सी है