Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 52, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
आकाशकालपवनादिपदार्थजातमस्याङ्गमङ्गरहितस्य तदप्यनङ्गम् ।
सर्वात्मकं सकलभावविकारशून्यमप्येतदाहुरजरं परमार्थतत्त्वम् ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, निरवयव इस परमात्मा के
जिस आकाश, काल, पवन आदिपदार्थ समूहरूप अंग का मैंने आपसे वर्णन किया है, वह भी
मिथ्या तथा अधिष्ठानमात्र शेष होने से अवयवशून्य ही है । इस प्रकार यद्यपि सम्पूर्ण
भावविकारों से शून्य यह अजर, परमार्थभूत आत्मतत्त्व है तथापि इसको सभी श्रुतियाँ सम्पूर्ण
पदार्थों के अध्यारोप से सर्वस्वरूप बतलाती हैं