Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 52, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
परमाणौ परमाणावत्र संसारमण्डलम् ।
विभाति भासुरारम्भं न विभाति च किंचन ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
है ओर वास्तव में कुछ भी नहीं भासता