Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 52, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
सरस्यतिरसे भान्ति चिद्घनामृतवृष्टयः ।
अविभागे विभागस्था अक्षोभे क्षुभिता इव ।
अविभाता विभान्तीव चिद्घने सृष्टिदृष्टयः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
नित्य निरतिशयानंद जलपरिपूर्णं चितिरूपी सरोवर में चिन्मय मेघ की अमृतमय वृष्टि
के सदृश ये सृष्टि की दृष्टियाँ भासित हो रही हँ । हे श्रीरामचन्द्रजी, विभाजक धर्मो से शून्य
रहने पर भी उस चिद्घन ब्रह्म मेँ ये सबके सब विभक्त तथा क्षोभरहित रहने पर भी क्षुभित
के समान, भासित न हुई भी ये सब अविद्या के कारण एक तरह से भासित हो रही हैं