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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 53, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

केवलं शान्तमत्यच्छमाद्यन्तपरिवर्जितम् । तद्विद्यते यत्र किल खमपि स्थूलमश्मवत् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

अतः जिसमें आकाश भी स्थूल पत्थर के सदृश है ओर जो केवल, शान्त, निर्मल आदि अन्त से शून्य है, वही सत्तार्थक भावशब्द का अर्थ हो सकता है दूसरा नहीं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है