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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

बोध एव कचत्यर्थरूपेण स च स्वादणुः । दृष्टान्तोऽत्रानुभूतोऽन्तः स्वप्नसंकल्पपर्वतः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

अर्थसत्ता न रहने पर भी बोध अथाकार से प्रकाशित होता हैं, इस विषय में व्रष्टान्त देते हैं / बोध ही अर्थ के रूप में स्फुरित होता है, वह आकाश से भी अतिसूक्ष्म है, इस विषय में स्वप्न और संकल्प का पर्वत दृष्टान्त है, जिसका सभी ने भीतर अनुभव किया है