Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
देशाद्देशान्तरप्राप्तौ क्षणान्मध्यं विदो वपुः ।
स्वरूपमजहत्त्वेव राजतेऽर्थविवर्तवत् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
द्रष्टारूप वेतन कहाँ अपने स्वरूप को छोड़कर प्रकाशता हैं, इस पर कहते हैं /
क्षणभर में शाखाप्रदेश से चन्द्रमा के प्रदेश तक गये हुए प्रमातारूप चेतन के मध्य का जो
स्वरूप है, वही अपने निष्प्रपंच स्वरूप को न छोड़कर ही प्रकाशता है, क्योंकि वहाँ बीज में
परमार्थरूप और आदि अन्त भाग में विवर्तरूप दोनों प्रकाशते हैं