Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
जगदास्ते परस्याणोरन्तरित्यपि नोचितम् ।
सार्षपे कणके मेरुरास्त इत्यज्ञकल्पना ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
“अणुः पन्थाः विततः “ इत्यादि श्रुति प्रमाण से ईश्वर में अगुत्व की कल्पना यद्यपि हो सकती
है, तथापि उसमें जयत् की स्थिति मानना अनुचित हैं. यह कहते हैं /
परमाणुरूप आत्मा के अन्दर सूक्ष्मरूप से जगत् है, यह कहना अनुचित ही है, क्योकि सरसों
के कण के अन्दर सुमेरु पर्वत है, यह अज्ञानियों की ही कल्पना है