Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
सति बीजे प्रवर्तन्ते कार्यकारणदृष्टयः ।
निराकारस्य किं बीजं क्व जन्यजनकक्रमः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि यह कहिए कि जगत् भी निराकार हैं, तब तो बीज आदि का अभाव होने से अनायास
ब्रह्मरूपता ही फालित हो जाती है, यह कहते हैं /
बीज की सत्ता होने पर ही कार्य, कारण आदि के ज्ञान हो सकते हैं, परन्तु निराकार वस्तु का
कौन-सा बीज और कहाँ उसमें जन्य-जनक का क्रम ?