Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
अतो यत्परमं तत्त्वं तदेवेदं जगत्स्थितम् ।
नेह प्रथयते किंचिन्न च किंचिद्विनश्यति ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए जो परम ब्रह्मतत्त्व है, वही
यह जगद्रूप बनकर स्थित है, यह आविर्भूत होकर न तो कुछ स्वरूप बतलाता है और न कुछ नष्ट
ही होता है