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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

चिदाकाशश्चिदाकाशे हृदि चित्त्वाज्जगद्भमम् । अशुद्धवदिवाशुद्धे शुद्धं शुद्धे प्रपश्यति ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

तब वह क्या चीज है, उसे कहते हैं / चिदाकाश ही (आकाशवत्‌ निर्मल चिति ही) चिदाकाशरूप हृदय चितिरूप होने के कारण जगद्भ्रम को अशुद्ध में अशुद्ध-सा ओर शुद्ध में शुद्ध-सा देखता है