Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
स्वमेवाभासते तस्य रूपं स्पन्द इवानिले ।
सर्गशब्दार्थकलना नेह काश्चन सन्ति नः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
वायु में स्पन्द की नाई
चिदाकाश में उसका स्वरूप चिदाकाशरूप ही भासित होता है, अतः हम लोगों की कोई भी सृष्टि-
शब्दार्थ की कल्पनाएँ यहाँ अपना अस्तित्व नहीं रखतीं