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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

समुद्रगिरिमेघोर्वीविस्फोटमयमप्यजम् । काष्ठमौनवदेवेदं जगद्ब्रह्मावतिष्ठते ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

समुद्र, पर्वत, मेघ, पृथ्वी, विस्फोट आदि पदार्थों से भरा जगत्‌ भी ब्रह्म है यानी समुद्र आदि अनेक विभागों से युक्त तथा विचित्र कारक, क्रिया, फल आदि से भासमान तत्‌-तत्‌ धर्म और धर्मियों का तात्त्विक स्वरूप भी निष्कर्ष में ब्रह्मरूप ही है, अतः यह समस्त जगत्‌ काष्ठमौन के सदुश निष्क्रिय ब्रह्मरूप ही ठहरता है