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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

द्रष्टा द्रष्टैव दृश्यस्य स्वभावात्स्वात्मनि स्थितः । कर्ता कर्तैव कर्तव्याभावतः कारणादृते ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

तो कर्तव्य निर्धारण किया जाय, पर कारण ही कोई नहीं है