Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
देशाद्देशान्तरप्राप्तौ क्षणान्मध्ये विदो वपुः ।
यत्तज्जगदितीवेदं व्योमात्मनि व्यवस्थितम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी प्रपंचरहित वस्तु की अप्रप्निद्धि शका तो बहुत स्थानों में निवृत्त की हैं, इसका स्मरण
कराते हैं /
क्षणभर में शाखादेश से चन्द्रप्रदेश तक प्रमातृचैतन्य के जाने पर उसका बीचवाला जो
सर्वोपद्रवशून्य निर्विषयस्वरूप है, वही यह जगत् सा बन गया है । इससे चिदाकाश में वह
व्यवस्थित है