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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

यथा स्पन्दोऽनिले तोये द्रवत्वं व्योम्नि शून्यता । तथा जगदिदं भातमनन्याश्लेषमात्मनि ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे वायु में स्पन्दन, जैसे जल में द्रवत्व है ओर आकाश में शून्यत्व प्रतीत होता है, वैसे ही यह जगत्‌ आत्मा में प्रतीत होता है, इसका किसी अन्य पदार्थ से सम्बन्ध नहीं है, यह असंग अद्रय आत्मरूप ही है