Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
संविन्नभो ननु जगन्नभ इत्यनर्कमात्मन्यवस्थितमनस्तमयोदयं क्व ।
तत्त्वङ्गभूतमखिलं तदनन्यदेव दृश्यं निरस्तकलनोऽम्बरमात्रमास्व ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् विन्यात्रस्वभाव है, यह जो सव तरह से कहा यया ह, उसे इकट्ठा करके उपदेश देते हुए
उपहार करते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, अपने परमार्थस्वभाव में स्थित हुआ जगत् सत्-स्वरूप है । चिदाकाश
शून्यभावापन्न प्रसिद्ध आकाशस्वरूप ही है, यह तो किसी तरह नहीं हो सकता, क्योकि
सूर्यरहित यानी सूर्य के उदय और अस्त से निर्मुक्त तथा अपने स्वरूप मेँ अवस्थित आकाश
कहाँ प्रसिद्ध है, सच्चित्स्वभाववाला या सूर्य आदि से रहित आकाश प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि जड़
आकाश ही प्रसिद्ध है । अपितु सच्चित्स्वभावभूत जो तत्त्व है, उससे सम्बद्ध ही सम्पूर्ण दृश्यों
का भान होता है, अतः सम्पूर्ण जगत् उस तत्त्व का ही अंगभूत है, शून्यात्मक आकाश का अंग
नहीं हे, इसलिए सच्चिदात्मा से अनन्य हे । इन सब बातों से आप समस्त कल्पनाओं का
परित्यागकर एकमात्र आकाशस्वरूप होकर ही स्थित रहिए