Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 55, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
पूर्वप्रवृत्ता सरितां रूढाद्यापि यथास्थिता ।
तरङ्गलेखा दृष्टीनां पदार्थरचना तथा ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
प्रथम संकल्प ही महाप्रलय तक समस्त पदार्थों के
स्वभाव की व्यवस्थापक नियति है । उसीके अनुसार आज भी सुव्यवस्थित पदार्थों की रचना एक
तरह से पहले की नाईं बह रही नदियों की तरंग रेखा है वही प्रत्यक्ष सिद्ध होती है