Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 55, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
यथा वारितरङ्गश्रीः सरितां रचना मिता ।
तथा चिद्व्योम्नि चिद्बीजसत्तान्तःसृष्टितामिता ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी स्थिति में जैसे तरंगों की सत्ता जल सत्ता से भिन्न दूसरी नहीं है, वैसे ही जयत् की
सत्ता भी विति की सत्ता से भिन्न दूसरी नहीं है, इस आशय से ब्रह्मोपादानकत्व का उवाद हैं,
यह कहते हैं /
जैसे जलतरंगों की शोभा ही नदियों की रचना को प्राप्त हुई है यानी नदियों की सत्ता
जलतरंग शोभा की सत्ता से पृथक् नहीं है, वैसे ही चिदाकाश के भीतर विद्यमान चितिरूप
बीजसत्ता ही सृष्टिरूपता को प्राप्त हो गई है यानी सृष्टि की सत्ता चितिसत्ता से अतिरिक्त
नहीं है, यह तात्पर्य है