Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 55, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
मृतस्यात्यन्तनाशश्चेत्तन्निद्रासुखमेव तत् ।
भूयश्चोदेति संसारस्तत्सुखं नवमेव तत् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह जगत् की अलग सत्ता न होने के कारण जन्म-मरण की भीति आ ही नहीं सकती,
किन्तु दोनों प्रसरो मे छख ही छख है, ऐसा कहते हैं /
यदि मृत व्यक्ति की आत्यन्तिक असत्ता मान ली जाय, तो भी ब्रह्मानन्द की सत्ता के ही
व्यक्ति और व्यक्तिनाश की सत्ता के रूप से अवशिष्ट होने से सुषुप्ति अवस्था में प्रसिद्ध
निरतिशयानन्दरूप सुख ही उसे प्राप्त हुआ ओर मर जाने के वाद फिर जो देहादिरूप संसार प्राप्त
होता है, वह उसका नवीन संसाररूप सुख भी ब्रह्मसुखरूप ही है, इसलिए सुखसत्ता से अतिरिक्त
किसी सत्ता के न रहने से भय की प्राप्ति ही नहीं हो सकती